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INDIAN MILITARY STRATEGY VS. FOREIGN WARFARE TECHNIQUES: A COMPARATIVE STUDY OF ANCIENT AND MEDIEVAL WARS

Original Article

INDIAN MILITARY STRATEGY VS. FOREIGN WARFARE TECHNIQUES: A COMPARATIVE STUDY OF ANCIENT AND MEDIEVAL WARS

भारतीय सैन्य रणनीति बनाम विदेशी युद्ध कौशल: प्राचीन और मध्यकालीन युद्धों का तुलनात्मक अध्ययन

 

Preeti Kumari 1*

1 Research Scholar, Department of History, Malwanchal University, Indore, Madhya Pradesh, India

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ABSTRACT

English: This research paper, "Indian Military Strategy vs. Foreign Warfare Techniques," is an analytical study of the war history of ancient and medieval India. The main objective of this research is to identify the strategic and technological factors that determined the outcomes of wars between Indian and foreign armies. While in ancient times, Indian military philosophy was based on 'Dharmayuddha' (righteous warfare) and the 'Chaturanga Sena' (especially elephants), foreign invaders (such as the Greeks, Turks, and Mughals) prioritized mobility, mounted archery, and advanced firepower.

This research paper studies the changes in warfare techniques through key historical examples such as Alexander and Porus (Battle of the Hydaspes), Prithviraj Chauhan and Muhammad Ghori (Battle of Tarain), and Babur and Ibrahim Lodi (First Battle of Panipat). The conclusion shows that despite the indomitable courage of Indian warriors, the technological superiority, diplomatic flexibility, and rapid mobility of foreign armies often overwhelmed Indian defensive and traditional strategies. This study highlights the need for strategic adaptation through military history.

 

Hindi: प्रस्तुत शोध पत्र "भारतीय सैन्य रणनीति बनाम विदेशी युद्ध कौशल" प्राचीन और मध्यकालीन भारत के युद्ध इतिहास का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन है। इस शोध का मुख्य उद्देश्य उन रणनीतिक और तकनीकी कारकों का पता लगाना है जिन्होंने भारतीय और विदेशी सेनाओं के बीच युद्धों के परिणाम निर्धारित किए। प्राचीन काल में जहाँ भारतीय सैन्य दर्शन 'धर्मयुद्ध' और 'चतुरंगिणी सेना' (विशेषकर हाथियों) पर आधारित था, वहीं विदेशी आक्रमणकारियों (जैसे ग्रीक, तुर्क और मुगल) ने गतिशीलता, अश्वारोही तीरंदाजी और उन्नत मारक क्षमता को प्राथमिकता दी।

यह शोध पत्र सिकंदर और पोरस (झेलम का युद्ध), पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गोरी (तराइन का युद्ध), तथा बाबर और इब्राहिम लोदी (पानीपत का प्रथम युद्ध) जैसे प्रमुख ऐतिहासिक उदाहरणों के माध्यम से युद्ध कौशल में आए परिवर्तनों का अध्ययन करता है। निष्कर्ष यह दर्शाता है कि भारतीय योद्धाओं के अदम्य साहस के बावजूद, विदेशी सेनाओं की तकनीकी श्रेष्ठता, कूटनीतिक लचीलापन और युद्ध के मैदान में तीव्र गतिशीलता अक्सर भारतीय रक्षात्मक और पारंपरिक रणनीतियों पर भारी पड़ी। यह अध्ययन सैन्य इतिहास के माध्यम से रणनीतिक अनुकूलन (Strategic Adaptation) की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।

 

Keywords: Indian Military Philosophy, Chaturanga Sena, Dharmayuddha vs. Kootayuddha (Deceptive Warfare), Strategic Adaptation, भारतीय सैन्य दर्शन, चतुरंगिणी सेना, धर्मयुद्ध बनाम कूटयुद्ध, सामरिक अनुकूलन


 

प्रस्तावना

भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास केवल सांस्कृतिक और आध्यात्मिक उत्थान की गाथा नहीं है, बल्कि यह निरंतर सैन्य संघर्षों और रणनीतिक विकास का भी गवाह रहा है। प्राचीन काल से ही भारत अपनी धन-संपदा के कारण विदेशी आक्रांताओं के आकर्षण का केंद्र रहा, जिसके परिणामस्वरूप यहाँ की स्वदेशी सैन्य परंपराओं का सामना विश्व की विभिन्न युद्ध संस्कृतियों से हुआ। भारतीय सैन्य रणनीति जहाँ मुख्य रूप से 'धर्मयुद्ध' और नैतिक सिद्धांतों पर आधारित थी, वहीं विदेशी आक्रामकों की रणनीति 'पूर्ण विजय' और 'सामरिक लचीलेपन' पर केंद्रित थी।

कौटिल्य के काल में भारतीय सैन्य विज्ञान अत्यधिक उन्नत था, जहाँ उन्होंने "विजिगीषु" (विजय की इच्छा रखने वाला राजा) की अवधारणा प्रस्तुत की थी Kautilya (1992)। हालांकि, समय के साथ भारतीय युद्ध कला में एक प्रकार की जड़ता (Stagnation) आ गई, जबकि मध्य एशिया और यूरोप में युद्ध की तकनीकें तेजी से विकसित हुईं। जदुनाथ सरकार के अनुसार, "भारतीय सेनाओं की सबसे बड़ी कमजोरी उनकी पारंपरिकता और हाथियों पर अत्यधिक निर्भरता थी, जिसने उन्हें गतिशील विदेशी घुड़सवारों के सामने असुरक्षित बना दिया" Sarkar (1960)।

यह शोध पत्र इस प्रश्न का अन्वेषण करता है कि क्यों श्रेष्ठ वीरता और संसाधनों के बावजूद भारतीय शासक कई महत्वपूर्ण युद्धों में विदेशी रणनीतियों के सामने विफल रहे। इसमें विशेष रूप से प्राचीन काल के ग्रीक आक्रमणों से लेकर मध्यकालीन मुगल आक्रमणों तक के रणनीतिक बदलावों का विश्लेषण किया गया है।

 

शोध पद्धति (Research Methodology)

इस शोध हेतु ऐतिहासिक और तुलनात्मक शोध पद्धति (Historical and Comparative Research Method) का प्रयोग किया गया है।

·        प्राथमिक स्रोत: अध्ययन के लिए प्राचीन ग्रंथों जैसे कौटिल्य का अर्थशास्त्र, कामंदक के नीतिसार, और मध्यकालीन वृत्तांतों जैसे तुजुक-ए-बाबरी का विश्लेषण किया गया है।

·        द्वितीयक स्रोत: आधुनिक इतिहासकारों जैसे ए.एल. बाशम, जदुनाथ सरकार और स्टीफन पी. कोहेन के शोध कार्यों का संदर्भ लिया गया है ताकि रणनीतिक अंतराल को समझा जा सके।

·        विश्लेषण: यह शोध मुख्य रूप से 'गुणात्मक विश्लेषण' (Qualitative Analysis) पर आधारित है, जिसमें युद्ध के मैदान की भौगोलिक स्थिति, हथियारों की तकनीक और नेतृत्व क्षमता के आधार पर तुलना की गई है।

"युद्ध केवल शारीरिक बल का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह दो मस्तिष्क और दो रणनीतियों के बीच का संघर्ष है" Cohen (1971) । इसी विचार को आधार बनाकर यह अध्ययन भारतीय और विदेशी सैन्य प्रणालियों के द्वंद्व को रेखांकित करता है।

 

प्राचीन कालीन युद्ध कौशल (Ancient Period)

भारतीय पक्ष: दार्शनिक और सामरिक आधार

प्राचीन भारत में युद्ध केवल भूमि विस्तार का साधन नहीं, बल्कि एक 'राजधर्म' माना जाता था। भारतीय सैन्य व्यवस्था का विकास वेदों से शुरू होकर महाकाव्यों और नीतिशास्त्रों तक एक सुव्यवस्थित ढांचे में हुआ।

1)     चतुरंगिणी सेना और संगठन

भारतीय सैन्य संरचना का मुख्य आधार 'चतुरंगिणी सेना' थी, जिसमें चार अंग शामिल थे: हस्ती (हाथी), रथ, अश्व (घोड़े) और पादति (पैदल सैनिक)।

·        गज सेना (War Elephants): प्राचीन भारतीय रणनीतिकारों ने हाथियों को 'प्राचीन काल के टैंक' के रूप में देखा। कौटिल्य के अनुसार, "सेना की विजय मुख्य रूप से हाथियों पर निर्भर करती है, क्योंकि वे शत्रु के कैंपों, द्वारों और दुर्गों को तोड़ने में सक्षम होते हैं" Kautilya (1992)।

·        रथ: महाकाव्य काल (रामायण और महाभारत) में रथ अभिजात वर्ग के योद्धाओं का मुख्य वाहन था, जो प्रहार की शक्ति (Shock Power) प्रदान करता था।

2)     युद्ध का नैतिक सिद्धांत: धर्मयुद्ध

भारतीय सैन्य दर्शन की सबसे विशिष्ट विशेषता 'धर्मयुद्ध' की अवधारणा थी। मनुस्मृति और महाभारत के शांति पर्व में युद्ध के कड़े नियम निर्धारित किए गए थे।

·        "निहत्थे, सोए हुए, या शरण में आए शत्रु पर वार करना निषिद्ध था" मनु, मनुस्मृति, VII.91-93 ।

·        इतिहासकार ए.एल. बाशम के अनुसार, “भारतीय युद्धों में नैतिकता और मानवीय मूल्यों का पालन इसे विश्व की अन्य संस्कृतियों से अलग बनाता था, हालांकि सामरिक दृष्टि से यह कभी-कभी आत्मघाती भी सिद्ध हुआ" Basham (1954)।

3)     कूटनीति और ‘कूट युद्ध’

यद्यपि धर्मयुद्ध आदर्श था, परंतु कौटिल्य ने यथार्थवादी राजनीति (Realpolitik) का समर्थन किया। उन्होंने तीन प्रकार के युद्ध बताए:

·        प्रकाश युद्ध: आमने-सामने का घोषित युद्ध।

·        कूट युद्ध: छल-कपट, मनोवैज्ञानिक युद्ध और छापामार रणनीतियां।

·        तुष्णीं युद्ध: गुप्तचरों के माध्यम से शत्रु को भीतर से कमजोर करना। विल्सन का तर्क है कि "कौटिल्य की रणनीतियां मैकियावेली से कहीं अधिक गहरी और व्यवस्थित थीं, जो दिखाती हैं कि प्राचीन भारत केवल आदर्शवादी नहीं बल्कि सामरिक रूप से अत्यंत चतुर भी था" Wilson (1840)।

4)     दुर्ग और रक्षात्मक रणनीति

प्राचीन भारतीयों ने किलाबंदी की कला में महारत हासिल की थी। ऋग्वेद में ‘पुर’ (किले) का उल्लेख मिलता है। कौटिल्य ने दुर्गों को राज्य के सात अंगों (सप्तांग सिद्धांत) में से एक माना है। उनके अनुसार, “एक सुरक्षित दुर्ग में बैठा राजा अपनी अल्प सेना के साथ भी शत्रु की विशाल सेना को पराजित कर सकता है" Kautilya (1992)।

5)     व्यूह रचना

भारतीय सेनाएं युद्ध क्षेत्र में जटिल ज्यामितीय आकृतियों में व्यवस्थित होती थीं, जिन्हें ‘व्यूह’ कहा जाता था। जैसे:

·        चक्रव्यूह: वृत्ताकार घेरा।

·        मकरव्यूह: मगरमच्छ की आकृति।

·        शकटव्यूह: गाड़ी या वैगन की आकृति। इन व्यूहों का उद्देश्य सेना के कमजोर अंगों की रक्षा करना और शत्रु को भ्रमित करना होता था व्यास, महाभारत, भीष्म पर्व।

 

विदेशी पक्ष: सामरिक नवाचार और गतिशीलता

प्राचीन काल में भारत पर हुए विदेशी आक्रमणों, विशेषकर सिकंदर महान (Alexander the Great) के अभियानों ने युद्ध कला के एक नए अध्याय की शुरुआत की।

1)     मेसेडोनियन फैलेन्क्स

सिकंदर की सेना की सबसे बड़ी शक्ति उसका ‘फैलेन्क्स’ फॉर्मेशन था। यह पैदल सैनिकों का एक ऐसा घना आयताकार दस्ता होता था, जो ‘सारिसा’ (Sarissa) नामक लंबी कतारबद्ध भाले (लगभग 18-20 फीट लंबे) लेकर चलता था।

·        इतिहासकार एरिअन (Arrian) के अनुसार, “यह भाले इतने लंबे होते थे कि अग्रिम पंक्ति के सैनिकों के पीछे की चार-पांच पंक्तियों के भाले भी शत्रु के लिए अभेद्य दीवार बना देते थे" Arrian (1971)।

·        यह तकनीक भारतीय हाथियों के विरुद्ध एक रक्षात्मक कवच का कार्य करती थी, जिससे हाथी सेना के भीतर प्रवेश नहीं कर पाते थे।

2)     संयुक्त शस्त्र रणनीति

विदेशी सेनाएं केवल एक अंग पर निर्भर नहीं थीं। सिकंदर ने ‘हैमर एंड एनविल’ (Hammer and Anvil) रणनीति का प्रयोग किया।

·        इसमें पैदल सेना (Anvil/निहाई) शत्रु को रोक कर रखती थी, जबकि भारी घुड़सवार सेना (Hammer/हथौड़ा) किनारे (Flanks) से हमला कर शत्रु को कुचल देती थी।

·        जैसा कि पीटर ग्रीन उल्लेख करते हैं, “सिकंदर की सफलता का रहस्य विभिन्न सैन्य इकाइयों के बीच वह सटीक समन्वय था, जिसकी भारतीय सेनाओं में कमी थी" Green (1974)।

3)     गतिशीलता और भूगोल का उपयोग

भारतीय सेनाएँ भौगोलिक रूप से स्थिर और भारी थीं, जबकि यूनानी और बाद में आए शक-कुषाण अत्यधिक गतिशील थे।

·        झेलम का युद्ध (326 ई.पू.): सिकंदर ने बरसात के मौसम में उफनती नदी को रात के अंधेरे में पार कर ‘चकित करने के तत्व’ (Element of Surprise) का उपयोग किया।

·        डब्लू.डब्ल्यू. टार्न के अनुसार, “विदेशी सैन्य नेतृत्व में जोखिम लेने की क्षमता और त्वरित निर्णय लेने का कौशल भारतीय पारंपरिक रक्षात्मक सोच से कहीं आगे था" Tarn (1948)।

4)     अश्वारोही धनुर्विद्या

प्राचीन काल के उत्तरार्ध में शक और कुषाण जैसी मध्य एशियाई जातियों ने भारत में ‘अश्वारोही धनुर्विद्या’ का परिचय दिया।

·        उनकी रणनीति ‘मारो और भागो’ (Hit and Run) पर आधारित थी। वे सरपट दौड़ते घोड़े से पीछे मुड़कर तीर चलाने में सक्षम थे, जिसे ‘पार्थियन शॉट’ कहा जाता था।

·        स्टीफन पी. कोहेन के अनुसार, “इस तकनीक ने युद्ध की परिभाषा बदल दी, क्योंकि अब भारी कवच वाले सैनिकों को दूर से ही मारना संभव हो गया था" Cohen (1971)।

 

 

5)     वैज्ञानिक घेराबंदी

विदेशी आक्रमणकारी अपने साथ ‘कैटापल्ट’ (Catapult) और ‘बैटरी रैम’ जैसे यंत्र लाते थे, जो दुर्गों की दीवारों को तोड़ने में सक्षम थे। भारतीय पक्ष जहाँ दुर्गों के भीतर रहकर दीर्घकालिक सुरक्षा की नीति अपनाता था, वहीं विदेशी पक्ष तकनीकी उपकरणों के माध्यम से दुर्गों को शीघ्र फतह करने की रणनीति रखता था।

प्राचीन विदेशी पक्ष ने युद्ध को एक ‘यांत्रिक कला’ (Mechanical Art) के रूप में विकसित किया था, जहाँ तकनीक और तालमेल को व्यक्तिगत शौर्य से ऊपर रखा गया। जैसा कि वी.ए. स्मिथ ने लिखा है, “भारतीयों की वीरता अद्वितीय थी, लेकिन उनकी रणनीति पुरानी पड़ चुकी थी" स्मिथ, The Early History of India, (1924)।

 

तुलनात्मक विश्लेषण: झेलम का युद्ध (Battle of Hydaspes)

झेलम का युद्ध (326 ई.पू.) सैन्य इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जहाँ दो भिन्न सैन्य विचारधाराओं का सीधा टकराव हुआ। एक ओर भारतीय उपमहाद्वीप की ‘विशालता और शक्ति’ (हाथी) थी, तो दूसरी ओर यूनानी ‘गति और रणनीति’ (घुड़सवार सेना)।

यह युद्ध इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण है कि कैसे सामरिक नवाचार ने संख्यात्मक और शारीरिक श्रेष्ठता को पराजित किया।

1)     सामरिक स्थिति और चक्रव्यूह

राजा पोरस ने अपनी सेना को एक रक्षात्मक दीवार के रूप में व्यवस्थित किया था। उनके केंद्र में लगभग 200 विशाल हाथी थे, जिन्हें 100 फीट की दूरी पर रखा गया था ताकि उनके बीच से पैदल सैनिक निकल सकें।

·        पोरस की सोच: हाथियों का उद्देश्य यूनानी घोड़ों को डराना था, क्योंकि घोड़े हाथियों की गंध और गर्जना से आतंकित हो जाते थे।

उद्धरण: इतिहासकार एरिअन के अनुसार, “पोरस का मानना था कि हाथियों की यह अभेद्य पंक्ति सिकंदर की घुड़सवार सेना के लिए एक ऐसी दीवार साबित होगी जिसे पार करना असंभव होगा" Arrian (1971)।

2)     सिकंदर की रणनीति: गति और पार्श्व हमला

सिकंदर ने हाथियों पर सीधा हमला करने के बजाय भारतीय सेना के ‘पार्श्वों’ (Flanks) को निशाना बनाया।

·        चकित करने का तत्व (Surprise): सिकंदर ने भारी बारिश और अंधेरे का लाभ उठाकर नदी के ऊपरी हिस्से से पार किया, जिससे पोरस की शुरुआती रणनीति विफल हो गई।

·        घुड़सवार सेना का वर्चस्व: सिकंदर के पास ‘कंपेनियन कैवेलरी’ (Companion Cavalry) थी। उसने देखा कि पोरस के रथ कीचड़ में फंस रहे थे, जबकि यूनानी घुड़सवार मैदान में तेजी से मुड़ने में सक्षम थे।

उद्धरण: जे.एफ.सी. फुलर ने उल्लेख किया है कि "सिकंदर की सफलता उसकी क्षमता में थी कि उसने पोरस को अपनी गति के अनुसार लड़ने पर मजबूर कर दिया, न कि पोरस की शर्तों पर" Fuller (1960)।

3)     हाथियों बनाम तीरंदाजी और लंबी दूरी के प्रहार

जब हाथियों ने हमला किया, तो सिकंदर ने अपने सैनिकों को हाथियों को सीधे मारने के बजाय उनके ‘महावतों’ को निशाना बनाने का आदेश दिया।

·        लाइट इन्फैंट्री: यूनानी हल्के पैदल सैनिकों ने हाथियों की आँखों और सूंड पर भालों और तीरों से हमला किया।

परिणाम: घायल हाथी नियंत्रण खो बैठे और अपनी ही सेना को कुचलने लगे। डब्लू.डब्ल्यू. टार्न के अनुसार, “हाथी अंततः एक ‘दुधारी तलवार’ (Double-edged sword) साबित हुए, जिन्होंने पोरस की अपनी सेना में अधिक तबाही मचाई" Tarn (1948)।

4)     तुलनात्मक निष्कर्ष तालिका

सामरिक पहलू

पोरस (भारतीय पक्ष)

सिकंदर (विदेशी पक्ष)

मुख्य प्रहार शक्ति

गज सेना (भारी और विनाशकारी)

घुड़सवार सेना (तेज और लचीली)

भौगोलिक अनुकूलन

अपनी भूमि पर रक्षात्मक स्थिति

कठिन परिस्थितियों में आक्रामक कूटनीति

नेतृत्व शैली

हाथी पर सवार (आसान लक्ष्य)

अग्रिम मोर्चे पर गतिशील नेतृत्व

कमजोरी

कीचड़ में रथों की विफलता

हाथियों के खिलाफ शुरुआती डर

 

वी.ए. स्मिथ का तर्क है कि इस युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया कि "केवल वीरता पर्याप्त नहीं है; युद्ध के मैदान में अनुशासन और बदलते परिवेश के अनुसार सामरिक परिवर्तन (Tactical Flexibility) ही जीत सुनिश्चित करते हैं" Smith (1919)। झेलम के युद्ध ने भारतीय शासकों को अश्वारोही सेना के महत्व को समझने पर मजबूर किया, लेकिन पूरी तरह से अपनाने में सदियां लग गईं।

 

 

मध्यकालीन युद्ध कौशल और बदलाव (Medieval Period)

भारतीय पक्ष: शौर्य, परंपरा और रक्षात्मक रणनीतियां

मध्यकालीन भारतीय सैन्य इतिहास मुख्य रूप से राजपूतों के शौर्य और उनके विशिष्ट युद्ध दर्शन के इर्द-गिर्द घूमता है। इस काल में भारतीय पक्ष ने ‘धर्मयुद्ध’ के आदर्शों को जारी रखा, लेकिन कुछ सामरिक सीमाओं के साथ।

1)     राजपूत शौर्य और ‘साका’ परंपरा

राजपूत युद्ध कौशल में व्यक्तिगत साहस और सम्मान (Honor) को सर्वोच्च स्थान दिया गया था। युद्ध उनके लिए केवल भूमि विस्तार नहीं, बल्कि कुल की प्रतिष्ठा का प्रश्न था।

·        साका और जौहर: जब दुर्ग को बचाना असंभव हो जाता था, तब राजपूत योद्धा ‘केसरिया’ पहनकर अंतिम युद्ध (साका) के लिए निकल पड़ते थे और महिलाएं ‘जौहर’ करती थीं।

उद्धरण: कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार, “राजपूतों का व्यक्तिगत साहस अद्वितीय था, लेकिन उनमें एक केंद्रीय नेतृत्व और राजनीतिक एकता का अभाव था, जिसने उन्हें संगठित विदेशी आक्रमणकारियों के सामने कमजोर कर दिया" Todd (1829)।

2)     किलाबंदी की कला

मध्यकाल में भारतीय पक्ष ने किलाबंदी को अपनी रक्षा का मुख्य स्तंभ बनाया। चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़ और रणथंभौर जैसे दुर्ग इसके जीवंत उदाहरण हैं।

·        ये किले ऊँची पहाड़ियों पर स्थित थे और इनमें ‘बहु-स्तरीय रक्षा’ (Multi-layered defense) की व्यवस्था थी।

उद्धरण: इतिहासकार सतीश चंद्र लिखते हैं, “मध्यकालीन भारतीय रक्षा नीति मुख्य रूप से दुर्ग-आधारित थी। दुर्ग केवल निवास नहीं थे, बल्कि वे शत्रु को दीर्घकाल तक उलझाने और उनकी आपूर्ति श्रृंखला को बाधित करने के केंद्र थे" Chandra (2007)।

3)     हाथियों पर निरंतर निर्भरता

प्राचीन काल की तरह मध्यकाल में भी भारतीय सेना का केंद्र ‘गज सेना’ ही रही। हाथियों को अभेद्य माना जाता था, लेकिन विदेशी घुड़सवारों के खिलाफ वे बाधा भी बने।

·        हाथी बनाम अश्व: हाथियों के कारण भारतीय सेना की गति धीमी हो जाती थी।

उद्धरण: जदुनाथ सरकार का तर्क है कि "भारतीय जनरलों का हाथी के ऊपर बैठना उन्हें शत्रु के लिए एक स्पष्ट लक्ष्य (Sitting duck) बना देता था। राजा की मृत्यु या पलायन पूरी सेना के बिखरने का कारण बनता था" Sarkar (1960)।

4)     पारंपरिक हथियार और युद्ध पद्धति

राजपूत और अन्य भारतीय शासक मुख्य रूप से भारी तलवारों, ढालों और भालों पर निर्भर थे।

·        युद्ध का स्वरूप: युद्ध अक्सर पूर्व-निर्धारित मैदानों पर आमने-सामने के द्वंद्व के रूप में होते थे।

·        छापामार तकनीक की कमी: प्रारंभिक मध्यकाल में भारतीय पक्ष ने छापामार (Guerilla) युद्ध कला को बहुत कम अपनाया (बाद में शिवाजी और महाराणा प्रताप ने इसे पुनर्जीवित किया)।

प्रमुख सामरिक सीमाएं

इस कालखंड में भारतीय पक्ष की सबसे बड़ी चुनौती तकनीक का अभाव और रणनीतिक जड़ता थी।

1)     पैदल सेना का निम्न स्तर: घुड़सवारों की तुलना में पैदल सैनिकों (Foot soldiers) को कम प्रशिक्षण दिया जाता था।

2)     समन्वय का अभाव: विभिन्न राजपूत रियासतों के बीच आपसी वैमनस्य के कारण एक एकीकृत ‘नेशनल मिलिट्री डॉक्ट्रिन’ का निर्माण नहीं हो सका।

“भारतीय सेनाएं एक विशाल जनसमूह की तरह थीं जिनमें व्यक्तिगत वीरता तो थी, लेकिन वे एक मशीन की तरह संगठित नहीं थीं जैसा कि तुर्क या मंगोल सेनाएं थीं" Cohen (1971)।

 

विदेशी पक्ष: तकनीकी नवाचार और सामरिक गतिशीलता

मध्यकालीन विदेशी रणनीतियाँ (विशेषकर तुर्क, मंगोल और मुगल) मुख्य रूप से गति, प्रहार और तकनीक पर आधारित थीं।

1)     मध्य एशियाई घुड़सवार तीरंदाज

मध्य एशियाई जनजातियों और तुर्कों की सबसे बड़ी ताकत उनके धनुर्धारी घुड़सवार थे। वे घोड़े पर सरपट दौड़ते हुए भी अचूक निशाना साध सकते थे।

·        रणनीति: वे भारतीय हाथियों के पास जाने के बजाय उनसे सुरक्षित दूरी बनाए रखते थे और तीरों की बौछार से उन्हें घायल कर देते थे।

उद्धरण: इतिहासकार मिनहाज-उस-सिराज के अनुसार, “तुर्क घुड़सवारों की गति इतनी तीव्र थी कि भारतीय पैदल सेना और हाथियों को संभलने का मौका ही नहीं मिलता था" सिराज, तबात-ए-नासिरी, 13वीं शताब्दी।

·        सामरिक श्रेष्ठता: जदुनाथ सरकार लिखते हैं कि "हाथी की तुलना में घोड़े की गति और तीरंदाज की दूरी ने भारतीय सेना के ‘Shock Tactics’ को विफल कर दिया" Sarkar (1960)।

2)     बारूद और तोपखाना

मुगल साम्राज्य की स्थापना के साथ ही भारतीय युद्ध भूमि पर बारूद का व्यापक प्रयोग शुरू हुआ। बाबर ने पानीपत के प्रथम युद्ध (1526) में तोपखाने का उपयोग करके युद्ध का रुख ही बदल दिया।

·        रूमी पद्धति: बाबर ने अपनी तोपों को बैलगाड़ियों से जोड़कर एक सुरक्षा कवच बनाया था, जिसे ‘रूमी पद्धति’ कहा जाता था।

उद्धरण: बाबरनामा में उल्लेख है कि "तोपों की गर्जना और बारूद के धुएं ने इब्राहिम लोदी के हाथियों में भगदड़ मचा दी, जिससे वे पीछे मुड़कर अपनी ही सेना को कुचलने लगे" Babur (1922)।

3)     ‘तुलुगमा’ पद्धति

बाबर ने मंगोलों और उज्बेकों से ‘तुलुगमा’ नामक घेराबंदी की रणनीति सीखी थी। इसमें सेना को केंद्र, दाएं-बाएं पार्श्वों (Flanks) और एक आरक्षित (Reserve) टुकड़ी में विभाजित किया जाता था।

·        क्रियान्वयन: जब शत्रु केंद्र पर हमला करता था, तो पार्श्वों पर तैनात घुड़सवार तेजी से घूमकर शत्रु को पीछे से घेर लेते थे।

उद्धरण: रशब्रुक विलियम्स के अनुसार, “तुलुगमा रणनीति ने अल्प संख्या वाली मुगल सेना को लोदी की विशाल सेना को चारों तरफ से घेरकर नष्ट करने में सक्षम बनाया" Williams (1918)।

4)     कमान और नियंत्रण

विदेशी सेनाओं में एक स्पष्ट ‘कमान संरचना’ थी। सेनापति युद्ध क्षेत्र के पीछे से पूरी स्थिति का निरीक्षण करता था और जरूरत पड़ने पर आरक्षित टुकड़ियों (Reserves) को भेजता था।

·        इसके विपरीत, भारतीय राजा अक्सर अग्रिम पंक्ति में हाथी पर सवार होते थे। स्टैनले लेन-पूल के अनुसार, “मुगल रणनीति में सेनापति का जीवित रहना और आदेश देना युद्ध जीतने के लिए अनिवार्य था, जबकि भारतीयों के लिए राजा का व्यक्तिगत शौर्य ही सब कुछ था" Lane-Poole (1903)।

प्रमुख सामरिक अंतर

·        शस्त्र कला: भारतीय पक्ष भारी तलवारों पर निर्भर था, जबकि विदेशी पक्ष ‘मिश्रित धनुष’ और मस्कट पर।

·        मनोवैज्ञानिक युद्ध: बारूद के धमाकों ने न केवल शारीरिक क्षति पहुंचाई बल्कि भारतीय सेना और जानवरों में मानसिक आतंक भी पैदा किया।

·        लचीलापन: विदेशी सेनाएं परिस्थिति के अनुसार अपनी व्यूह रचना बदलने में अधिक सक्षम थीं।

 

तुलनात्मक विश्लेषण: तराइन और पानीपत के युद्ध

1)     तराइन का द्वितीय युद्ध (1192): गति बनाम परंपरा

तराइन के प्रथम युद्ध में पराजय के बाद, मोहम्मद गोरी ने अपनी रणनीति में आमूलचूल परिवर्तन किया, जबकि पृथ्वीराज चौहान की सेना अपनी पारंपरिक युद्ध पद्धति पर टिकी रही।

·        गोरी की रणनीति: गोरी ने अपनी सेना को पांच इकाइयों में बांटा। उसने अपने 10,000 घुड़सवार तीरंदाजों को आदेश दिया कि वे राजपूत सेना पर चारों ओर से हमला करें और जब राजपूत उन पर प्रहार करने आएं, तो वे पीछे हट जाएं।

·        चौहान की सेना की सीमा: राजपूत सेना हाथियों और भारी पैदल सेना पर निर्भर थी, जो तुर्कों की ‘मारो और भागो’ पद्धति का सामना करने में असमर्थ रही।

उद्धरण: इतिहासकार सतीश चंद्र के अनुसार, “तुर्क घुड़सवारों की गतिशीलता और उनके द्वारा अपनाई गई थकाने वाली रणनीति ने राजपूतों की शक्ति को बिखेर दिया, जिससे उनकी हार सुनिश्चित हुई" Chandra (2007)।

2)     पानीपत का प्रथम युद्ध (1526): तकनीक बनाम विशालता

पानीपत के मैदान में बाबर की मात्र 12,000 की सेना ने इब्राहिम लोदी की 1,00,000 की विशाल सेना और 1,000 हाथियों को परास्त किया। यहाँ निर्णायक भूमिका तकनीक की थी।

·        बाबर का तोपखाना: बाबर ने ‘उस्ताद अली’ और ‘मुस्तफा’ के नेतृत्व में प्रभावी तोपखाने का उपयोग किया। बारूद के धमाकों ने लोदी के हाथियों को आतंकित कर दिया, जिससे वे अपनी ही सेना को कुचलने लगे।

·        तुलुगमा और अरबा: बाबर ने 700 गाड़ियों को चमड़े की रस्सियों से बांधकर एक सुरक्षा पंक्ति बनाई, जिसके पीछे तोपें सुरक्षित थीं। साथ ही ‘तुलुगमा’ टुकड़ियों ने लोदी की सेना को पीछे से घेर लिया।

उद्धरण: लेन-पूल के अनुसार, “बाबर की जीत का श्रेय उसके श्रेष्ठ तोपखाने और कमान व्यवस्था को जाता है, जिसने लोदी की मध्यकालीन भीड़ को एक आधुनिक सैन्य मशीन के सामने ला खड़ा किया" Babur (1899)।

3)     मुख्य तुलनात्मक बिंदु

पहलू

तराइन का द्वितीय युद्ध (1192)

पानीपत का प्रथम युद्ध (1526)

विदेशी पक्ष की मुख्य शक्ति

अश्वारोही तीरंदाज (Horse Archers)

तोपखाना और बारूद (Artillery)

भारतीय पक्ष की कमजोरी

गतिहीनता और पारंपरिक युद्ध नीति

हाथियों पर निर्भरता और रणनीतिक जड़ता

निर्णायक रणनीति

सामरिक पीछे हटना (Tactical Retreat)

घेराबंदी (Tulughma) और तोपखाना

नेतृत्व का प्रभाव

गोरी की प्रत्यक्ष युद्ध कमान

बाबर की वैज्ञानिक व्यूह रचना

 

विश्लेषण का निष्कर्ष

इन दोनों युद्धों में एक समानता स्पष्ट थी: भारतीय सेनाओं के पास शौर्य की कमी नहीं थी, लेकिन उनके पास ‘रणनीतिक प्रत्युत्तर’ का अभाव था।

जदुनाथ सरकार ने सटीक टिप्पणी की है: "भारतीय जनरल अक्सर पिछले युद्ध की सफलताओं के आधार पर अगला युद्ध लड़ते थे, जबकि विदेशी आक्रांता नई तकनीकों और युद्ध क्षेत्र के भूगोल के अनुसार अपनी रणनीति बदलते थे" Sarkar (1960)।

 

रणनीतिक तुलना के मुख्य बिंदु (Key Comparative Points)

प्राचीन और मध्यकालीन साक्ष्यों के आधार पर दोनों पक्षों के बीच निम्नलिखित मुख्य रणनीतिक अंतर स्पष्ट होते हैं:

1)     युद्ध दर्शन: नैतिकता बनाम उपयोगितावाद

·        भारतीय पक्ष: भारतीय युद्ध कला ‘धर्मयुद्ध’ के सिद्धांतों से बंधी थी। युद्ध का उद्देश्य शत्रु का विनाश नहीं, बल्कि न्याय की स्थापना और शौर्य का प्रदर्शन था। इसमें छल-कपट को हेय दृष्टि से देखा जाता था।

·        विदेशी पक्ष: यूनानी, तुर्क और मंगोलों के लिए युद्ध का एकमात्र उद्देश्य ‘पूर्ण विजय’ था। वे ‘कूट युद्ध’ में विश्वास रखते थे, जहाँ विजय के लिए किसी भी साधन का उपयोग वैध था।

उद्धरण: इतिहासकार ए.एल. बाशम के अनुसार, “भारतीयों का युद्ध के प्रति खेल जैसा दृष्टिकोण अक्सर उन विदेशी शत्रुओं के सामने विफल रहा जिनके लिए युद्ध केवल अस्तित्व और सत्ता का संघर्ष था" Basham (1954)।

2)     सैन्य संरचना और गतिशीलता

·        भारतीय पक्ष: भारतीय सेनाओं का केंद्र ‘भारी बल’ (Heavy Force) था। हाथी और भारी पैदल सेना सुरक्षा तो प्रदान करते थे, लेकिन उनमें गति का अभाव था।

·        विदेशी पक्ष: विदेशी सेनाएँ ‘हल्की और गतिशील’ (Light and Mobile) थीं। उनके अश्वारोही तीरंदाज किसी भी समय दिशा बदलकर हमला करने में सक्षम थे।

उद्धरण: स्टीफन पी. कोहेन के अनुसार, “भारतीय सैन्य तंत्र ‘रक्षात्मक जड़ता’ (Defensive Stagnation) का शिकार था, जबकि विदेशी पक्ष ‘आक्रामक गतिशीलता’ (Offensive Mobility) का प्रतिपादक था" Cohen (1971)।

3)     नेतृत्व और कमान ढांचा

तुलना का आधार

भारतीय नेतृत्व

विदेशी नेतृत्व

राजा की स्थिति

राजा सेना के बीच हाथी पर सवार (दृश्यमान लक्ष्य)

सेनापति अक्सर पीछे से रणनीतिक कमान संभालता था

संकट प्रबंधन

राजा की मृत्यु = सेना की हार और पलायन

स्पष्ट कमान श्रृंखला (Chain of Command)

रिजर्व सेना

आरक्षित टुकड़ियों (Reserves) का न्यूनतम उपयोग

युद्ध के अंतिम प्रहार के लिए ‘रिजर्व’ का चतुर उपयोग

 

उद्धरण: जदुनाथ सरकार का तर्क है कि "भारतीय राजाओं का व्यक्तिगत वीरता दिखाना ही उनके राज्य के पतन का कारण बना, क्योंकि सेना एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द केंद्रित थी, न कि किसी संस्थागत ढांचे के" Sarkar (1960)।

4)     तकनीकी अनुकूलन

भारतीय पक्ष ने नई तकनीकों को अपनाने में अत्यधिक समय लिया। उदाहरण के लिए, मध्य एशिया में धनुष और रकाब (Stirrup) का विकास बहुत पहले हो चुका था, लेकिन भारत में इसका प्रभावी उपयोग बहुत बाद में हुआ।

उद्धरण: इरफान हबीब के अनुसार, “लोहे की रकाब और बारूद जैसे तकनीकी नवाचारों ने विदेशी आक्रमणकारियों को वह बढ़त दी जिसे भारतीय वीरता अकेले नहीं काट सकी" Habib (2008)।

तुलनात्मक निष्कर्ष सारणी

रणनीतिक कारक

भारतीय सैन्य शैली

विदेशी सैन्य शैली

मुख्य शस्त्र

तलवार, हाथी और भारी धनुष

हल्का मिश्रित धनुष, तोपखाना और मस्कट

व्यूह रचना

स्थिर और ज्यामितीय (जैसे चक्रव्यूह)

गतिशील और लचीली (जैसे तुलुगमा)

भौगोलिक ज्ञान

स्थानीय भूगोल पर अत्यधिक भरोसा

अज्ञात क्षेत्रों में नवीन संचार और रसद (Logistics)

मनोविज्ञान

सम्मान और बलिदान (Sacrifice)

सामरिक विजय और लूट (Pragmatism)

 

तकनीकी और मनोवैज्ञानिक कारक (Technical and Psychological Factors)

1)     तकनीकी कारक: मारक क्षमता और उपकरण

भारतीय सेनाओं ने तकनीकी नवाचारों को अपनाने में अक्सर देरी की, जबकि विदेशी सेनाओं की ताकत ही उनके नए उपकरण थे।

·        धनुष और रकाब (The Bow and Stirrup): मध्य एशियाई सेनाओं के पास 'मिश्रित धनुष' (Composite Bow) थे, जो भारतीय बांस के धनुषों की तुलना में अधिक दूरी तक और सटीकता से मार सकते थे। साथ ही, लोहे की 'रकाब' ने विदेशी घुड़सवारों को घोड़े पर मजबूती से टिकने और तेजी से वार करने में मदद की।

उद्धरण: इरफान हबीब के अनुसार, "रकाब के आविष्कार ने घुड़सवार को एक स्थिर मंच प्रदान किया, जिससे वह सरपट दौड़ते हुए भी भारी वार कर सकता था, जो भारतीय घुड़सवारों के लिए कठिन था" Habib (2008)।

·        हथियार और कवच: जहाँ भारतीय योद्धा भारी तलवारों और ढालों पर निर्भर थे, वहीं मंगोल और तुर्क हल्के लेकिन अभेद्य कवच (Chainmail) का उपयोग करते थे, जो उन्हें गति प्रदान करता था।

·        बारूद का प्रभाव: बाबर के तोपखाने ने न केवल शारीरिक क्षति पहुंचाई, बल्कि मध्यकालीन भारत की 'किलाबंदी' की अपराजेयता के मिथक को भी तोड़ दिया।

उद्धरण: "तोपखाने ने युद्ध के मैदान में दूरी का सिद्धांत बदल दिया; अब शत्रु को पास आने से पहले ही नष्ट करना संभव था" Wilson (1840)।

2)     मनोवैज्ञानिक कारक: मनोबल और युद्ध दर्शन

युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि मस्तिष्क से भी लड़े जाते हैं। यहाँ दोनों पक्षों की मानसिकता में गहरा अंतर था।

·        व्यक्तिगत शौर्य बनाम सामूहिक अनुशासन: भारतीय योद्धा (विशेषकर राजपूत) व्यक्तिगत वीरता और 'वीरगति' को सर्वोच्च मानते थे। उनके लिए युद्ध एक उत्सव था। इसके विपरीत, विदेशी सेनाएं एक 'मशीन' की तरह काम करती थीं, जहाँ व्यक्तिगत गौरव से अधिक महत्वपूर्ण 'मिशन की सफलता' थी।

उद्धरण: "भारतीयों के लिए मृत्यु सम्मान थी, लेकिन विदेशी आक्रांताओं के लिए जीत ही सम्मान थी" Smith (1919)।

·        हाथियों का मनोवैज्ञानिक आतंक: शुरुआत में हाथियों ने विदेशी सेनाओं में डर पैदा किया, लेकिन एक बार जब उनकी कमजोरी (आंखों और सूंड पर हमला) का पता चला, तो वही हाथी अपनी ही सेना के लिए मनोवैज्ञानिक बोझ बन गए।

·        धार्मिक और वैचारिक प्रेरणा: विदेशी सेनाएं अक्सर 'जिहाद' या 'साम्राज्य विस्तार' की तीव्र वैचारिक प्रेरणा से लेश थीं, जिसने उन्हें अपरिचित और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी लड़ने का साहस दिया।

·        राजा की स्थिति का मनोवैज्ञानिक प्रभाव: भारतीय सेनाओं में राजा का हाथी पर सवार होना उसे प्रेरणा का स्रोत तो बनाता था, लेकिन उसके गिरते ही सेना में मनोवैज्ञानिक रूप से भगदड़ मच जाती थी।

उद्धरण: जदुनाथ सरकार लिखते हैं, "भारतीय सेना एक व्यक्ति-केंद्रित समूह थी; नेता के लुप्त होते ही उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता था" Sarkar (1960)।

3)     कमान और रसद

तकनीकी रूप से विदेशी सेनाओं की रसद व्यवस्था अधिक सुव्यवस्थित थी। वे लंबी दूरी तय करने के लिए 'मोबाइल आपूर्ति श्रृंखला' का उपयोग करते थे, जबकि भारतीय सेनाएं अक्सर अपने ही क्षेत्र की रसद पर निर्भर रहती थीं, जो घेराबंदी के समय उनकी कमजोरी बन जाती थी।

 

निष्कर्ष

भारतीय सैन्य रणनीति और विदेशी युद्ध कौशल का तुलनात्मक अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि युद्ध केवल शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि निरंतर विकसित होने वाली एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। प्राचीन और मध्यकालीन भारत का इतिहास शौर्य और बलिदान की गाथाओं से भरा है, किंतु सामरिक दृष्टि से यह अध्ययन कुछ कड़वे सत्यों को भी उजागर करता है।

 

शोध के प्रमुख परिणाम

1)     रणनीतिक जड़ता बनाम नवाचार: भारतीय पक्ष लंबे समय तक 'गज सेना' और 'धर्मयुद्ध' के आदर्शों पर टिका रहा। इसके विपरीत, विदेशी आक्रांताओं ने अपनी रणनीतियों को समय और तकनीक (जैसे रकाब, अश्वारोही तीरंदाजी और तोपखाना) के अनुसार बदला। जदुनाथ सरकार के शब्दों में, "भारतीय विफलता का मुख्य कारण बदलती सैन्य क्रांति के प्रति उनकी उदासीनता थी"।

2)     गतिशीलता का महत्व: झेलम से लेकर पानीपत तक, हर निर्णायक युद्ध में 'गति' (Mobility) ने 'स्थिरता' (Stability) को पराजित किया। विदेशी सेनाओं की त्वरित आवाजाही और पार्श्व हमलों (Flank Attacks) ने भारतीय रक्षात्मक किलाबंदी को निरर्थक साबित कर दिया।

3)     कमान संरचना की कमजोरी: भारतीय सैन्य प्रणाली में अत्यधिक केंद्रीकरण (राजा का केंद्र होना) एक बड़ी मनोवैज्ञानिक कमजोरी थी। जैसा कि स्टीफन कोहेन ने उल्लेख किया है, "राजा की मृत्यु केवल एक नेता की क्षति नहीं, बल्कि पूरी सेना का रणनीतिक पतन बन जाती थी"।

ऐतिहासिक सबक

इस तुलनात्मक अध्ययन से यह सिद्ध होता है कि तकनीकी श्रेष्ठता और सामरिक लचीलापन (Tactical Flexibility) किसी भी युद्ध के वास्तविक निर्णायक होते हैं। राजपूतों और अन्य भारतीय योद्धाओं के पास अदम्य साहस था, लेकिन वे 'संयुक्त शस्त्र रणनीति' (Combined Arms Strategy) विकसित करने में पीछे रह गए, जिसका लाभ विदेशी सेनाओं ने उठाया।

आधुनिक परिप्रेक्ष्य

आज की भारतीय सैन्य रणनीति ने इन ऐतिहासिक भूलों से महत्वपूर्ण सबक सीखे हैं। वर्तमान में भारतीय सेना का ध्यान 'नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर', स्वदेशी रक्षा तकनीक और तीनों सेनाओं के बीच बेहतर समन्वय पर है। यह शोध रेखांकित करता है कि किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा के लिए केवल वीरता पर्याप्त नहीं है, बल्कि निरंतर सैन्य आधुनिकीकरण और रणनीतिक दूरदर्शिता अनिवार्य है।

"इतिहास हमें सिखाता है कि जो राष्ट्र अपनी सैन्य तकनीक को अद्यतन करने में विफल रहते हैं, उन्हें अपनी सीमाओं के साथ समझौता करना पड़ता है".

  

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